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ज्योतिष सीखें

पश्चिमी ज्योतिष में भाव

भाव बताते हैं कि कुंडली की ऊर्जाएँ जीवन में कहाँ प्रकट होती हैं।

पश्चिमी भाव जन्म के समय और स्थान के अनुसार आकाश को बारह जीवन-क्षेत्रों में बाँटते हैं। इनके अर्थ वैदिक भावों से कई जगह मिलते हैं, लेकिन पद्धति, भाव-विभाजन और व्याख्या के उद्देश्य के अनुसार जोर अलग हो सकता है।

कोई भाव अपने आप नहीं फल देता। उसके स्पर्श पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी और उस भाव में बैठे ग्रह सभी मिलकर फल बनाते हैं। यही बहु-स्तरीय दृष्टि ‘10वाँ भाव = केवल करियर’ जैसी सरल धारणाओं से बचाती है।

कोण भाव

1, 4, 7 और 10 भाव कोण भाव माने जाते हैं और अक्सर प्रमुख रहते हैं। ये स्वयं, जड़ें, साझेदारी और सार्वजनिक जीवन को दर्शाते हैं, इसलिए इनमें स्थित ग्रह व्याख्या में अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

कैडेंट और सक्सीडेंट भाव

सक्सीडेंट भाव कोणों पर शुरू हुई चीज़ों को स्थिर और विकसित करते हैं, जबकि कैडेंट भाव उन प्रक्रियाओं को समझने, ढालने और फैलाने का काम करते हैं। इस लय से समझ आता है कि कोई विषय सीधा है, स्थिर हो रहा है या परिवर्तनशील है।

भाव-विभाजन पद्धति बदल सकती है

पश्चिमी परंपराएँ प्लासिडस, होल साइन, इक्वल या अन्य भाव-विभाजन पद्धतियों का उपयोग कर सकती हैं। एक ही ग्रह अलग पद्धति में अलग भाव में जा सकता है, इसलिए जिम्मेदार व्याख्या के लिए एक ही पद्धति में निरंतरता आवश्यक है।

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